जल की बूँद-बूँद कीमती है। ***** स्नान बाल्टी में पानी भरकर करे, फव्वारे से नहीं। ***** शेव व दंत मंजन मग में पानी भरकर करें, नल लगातार चालू रखकर नहीं। ***** कपडों की धुलाई बाल्टी में पानी भरकर करें, नल लगातार चालू रखकर नहीं। ***** वाहन बाल्टी में पानी भरकर साफ करें, नल से पाईप लगाकर नहीं। ***** पौधे लगे गमलों में पानी मग से डालें, नल में पाइप लगाकर नहीं। ***** घर के फर्श की धुलाई बाल्टी से पानी डालकर करें, नल में पाइप लगाकर नहीं। ***** खराब नल से टपकता पानी बंद करने के लिये तुरन्त कार्यवाही करें, आलस नहीं। ***** जल सम्पदा सीमित है इसका मितव्ययता पूर्वक सदुपयोग करें, अपव्यय नहीं। ***** जब पानी बिकेगा तोल, तब समझोगे इसका मोल! ***** बूँद-बूँद पानी, बचाऐ सो ज्ञानी।

चम्बल के किनारे

कई दिनों से कार्यालय के कार्यों में बाहर रहा। शहरों की भागदौड़, मीटिंग्स की गूंज, और फ़ाइलों की दुनिया में कहीं खुद को खोया सा महसूस कर रहा था। हर सुबह एक नई ज़िम्मेदारी, हर रात अधूरी नींद। लेकिन आज... आज मैं वापस हूँ। रावतभाटा में। अपने शहर में। अपने किनारे पर।


चंबल की लहरें आज कुछ अलग सी लग रही हैं। जैसे वो मुझे पहचानती हैं। जैसे कह रही हों—"तू लौट आया, चल बैठ, कुछ देर हमारे पास।"



मैं किनारे पर बैठा हूँ। हवा में वो पुरानी सादगी है, जो बड़े शहरों में खो जाती है। मिट्टी की ख़ुशबू, पानी की सरसराहट, और मन की शांति—सब कुछ जैसे फिर से जीवंत हो गया है।


थकान है, पर सुकून भी है।  

दूरी थी, पर अब अपनापन है।  

काम ज़रूरी था, पर यह पल जरूरी है आत्मा के लिए।

रात गहराती जा रही है,  

पर मेरे भीतर एक उजाला है—  

जो कल की सुबह को दिशा देगा

कुछ नया रचने का

कुछ बेहतर करने का



“शब्द जब भीतर बोलने लगें, तो वे काग़ज़ पर उतरने ही चाहिए।”


यह ब्लॉग मेरे मन के उन पन्नों का संग्रह है, जो कभी डायरी के रूप में बहते हैं, कभी कविता बनकर गुनगुनाते हैं, तो कभी कहानी बनकर किसी और का जीवन जी लेते हैं। यहाँ न कोई बड़े दावे हैं, न कोई भाषाई चमत्कार—बस कुछ अनुभव, कुछ भावनाएँ, और कुछ शब्द, जो मेरी आत्मा के सबसे पास हैं।


यहाँ आप पाएँगे मेरी यात्रा, मेरी संवेदनाएँ, मेरी चुप्पियाँ... और शायद कभी-कभी अपने ही मन की कोई गूंज।

यह ब्लॉग सिर्फ एक डिजिटल मंच नहीं है, यह मेरी आत्मा का आईना है। यहाँ जो कुछ भी है—वो बस यूँ ही नहीं लिखा गया, वो जिया गया है। कभी किसी शांत सुबह की डायरी, कभी स्मृतियों से गुथी कोई कविता, तो कभी कल्पना से जन्मी एक कहानी—हर पंक्ति में मैं हूँ।


जब मैंने पहली बार कलम उठाई थी, तब शायद मैं खुद को ही समझना चाहता था। धीरे-धीरे शब्द मेरे साथी बन गए। वे मेरी चुप्पियों को आवाज़ देने लगे, मेरी संवेदनाओं को आकार देने लगे। इस ब्लॉग पर वही शब्द, उन्हीं क्षणों के प्रमाण बनकर बसे हैं।


यहाँ आपको मिलेंगी मेरी डायरी की झलकियाँ—जहाँ हर दिन की धड़कन दर्ज है। कुछ कविताएँ—जो उदासी में संबल हैं, और खुशी में राग हैं। कुछ कहानियाँ—जिनमें मेरे ही हिस्से बिखरे हुए हैं, और शायद आपके भी। कभी कोई क्षण इतना अपना सा लगा कि उसे बचा लिया मैंने, इन पन्नों पर सहेज कर।


यह ब्लॉग हर उस पाठक के लिए है जो अपनी भी भावनाओं को शब्दों में ढूँढ रहा है। शायद मेरी कहानियों में उसे अपनी कोई परछाईं मिल जाए, या मेरी कविताओं में कोई अनकहा एहसास।


स्वागत है इस भावनाओं की यात्रा में, जहाँ हर मोड़ पर कोई अनुभव, कोई दृश्य, और कोई अधूरी बात—आपका इंतज़ार कर रही है।



रावतभाटा में मानसून की पहली अनुभूति

दिनांक: 23 जून  2025  सोमवार

स्थान: जलदाय विभाग परिसर रावतभाटा , राजस्थान


आज जब सुबह उठकर खिड़की खोली, तो एक ठंडी-सी हवा ने चेहरे को छुआ—जैसे महीनों से गर्मी की तपिश सहने के बाद प्रकृति ने राहत की साँस ली हो। रावतभाटा में अब मुझे पाँच महीने हो गए हैं। ऐसा लग रहा है जैसे यह जगह अब सिर्फ “कार्यस्थल” नहीं रही—यह मेरा अपना एक हिस्सा बन गई है।

रावतभाटा डायरी — दिन प्रथम रावतभाटा स्थानांतरण के बाद की पहली सुबह

आज चंबल की हवा ने मेरा नाम लिया।

सुबह ऑफिस जाते वक़्त जो सबसे पहले महसूस हुआ, वो था शांति का अजीब-सा वजन — न भारी, न हल्का, बस बहुत सच।

राणा प्रताप सागर बांध के पास मेरा नया कार्यालय है। वहाँ पहुंचते ही लगा, जैसे इंजीनियरिंग अब सिर्फ़ गणनाएँ नहीं, ज़मीन से जुड़ा कोई रिश्ता बन गई है। दफ़्तर सादा है, पर कार्यालय के पास बहती चंबल नदी सब कुछ खास बना देती है। वो बहती है, जैसे बिना कहे सब समझा रही हो।

चम्बल के किनारे एक वादा

चम्बल के किनारे, शाम की गुलाबी चादर ओढ़े हुए एक सजी-धजी बारात ठहरी है। लहरों की हल्की सरसराहट और पेड़ों पर लटकी झालरें जैसे खुद प्रकृति ने मेहमानों का स्वागत करने को सजावट की जिम्मेदारी ली हो।

 

सूखा तालाब, एक कहानी अनकही।

सूखा तालाब, एक कहानी अनकही,

जल था जिसमें कभी, अब रेत ही रेत बिछी।

चांद अपनी कहानी सुनाता है।

चांद तारों की गवाही से जुदा, आसमान में खो जाने की चाह, जब रात की चादर धक जाती है, तो वो चांद अपनी कहानी सुनाता है।

उसकी चाहत भी तारों से ज्यादा दूर, जैसे वो अपनी रौशनी को छुपाता है, जब रात की गहराईयों में खो जाता है, तो वो चांद अपनी कहानी सुनाता है।

बरगद की छांव

बरगद की छांव में, जहां धरती से मिलता आसमान, वहां बैठकर कुछ पल, जी लेता हूँ मैं अपनी जिंदगानी।

उसकी जड़ें गहरी हैं, उसकी शाखाएँ फैली हुई, जैसे बुजुर्गों का आशीर्वाद, सदा सर पर छाया हुआ।

विश्व जल दिवस: जीवन के अमृत की रक्षा

जल ग्रह के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक है। विश्व जल दिवस पानी के जिम्मेदार उपयोग और सभी के लिए सुरक्षित पानी तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है।

●Why Don't We Manufacture Water?●

आप लोगो ने अक्सर जल संकट के ऊपर होती कैंपेन देखी,सुनी होगी
कभी आपके दिमाग में ये ख्याल आया है कि... अगर पानी की पृथ्वी पे इतनी ही दिक्कत है तो... हम पानी बना क्यों नहीं लेते?