आज चंबल की हवा ने मेरा नाम लिया।
सुबह ऑफिस जाते वक़्त जो सबसे पहले महसूस हुआ, वो था शांति का अजीब-सा वजन — न भारी, न हल्का, बस बहुत सच।
राणा प्रताप सागर बांध के पास मेरा नया कार्यालय है। वहाँ पहुंचते ही लगा, जैसे इंजीनियरिंग अब सिर्फ़ गणनाएँ नहीं, ज़मीन से जुड़ा कोई रिश्ता बन गई है। दफ़्तर सादा है, पर कार्यालय के पास बहती चंबल नदी सब कुछ खास बना देती है। वो बहती है, जैसे बिना कहे सब समझा रही हो।
आज दोपहर जब र्कायालय में कदम रखा तो कंधों पर सिर्फ़ फ़ाइलों का बोझ नहीं था — एक अजनबी शहर को अपना बनाने की ज़िम्मेदारी भी थी।
मैंने आज महसूस किया कि एक नया शहर सिर्फ़ सड़कें, मकान या ऑफिस नहीं होता। वो होता है — एक नयी साँस, जिसे लेने में थोड़ा समय लगता है… लेकिन जब वो भीतर बसने लगती है, तो लगता है जैसे आप दोबारा जीना सीख रहे हों।
आज सुबह कुछ अलग थी। रावतभाटा में जीवन की यह पहली सुबह थी, और मैं इसे महसूस कर रहा था। कार्यालय जाने की तैयारी करते समय आईने में झाँककर खुद से कहा—"अब तू सिर्फ एक अभियंता नहीं रहा, तू एक उम्मीद है उस व्यवस्था की जो जल जैसा बहती है—चुपचाप, लेकिन जीवनदायिनी।"
बाँध के पास स्थित कार्यालय तक का रास्ता बहुत शांत और सुंदर है। चिड़ियों की चहचहाहट और हवा में भीनी-भीनी ठंडक ने भीतर कुछ सुलगा दिया—मानो प्रकृति कह रही हो, “स्वागत है तुम्हारा।”
दफ्तर पहुँचा, तो सहकर्मियों के चेहरे नई ऊर्जा लेकर सामने आए। स्वागत आत्मीय था—जैसे कोई कह रहा हो, “तुम्हारा यहाँ होना ज़रूरी था।” आज ज्यादा काम नहीं था, लेकिन जो भावनाएँ थीं, वो लंबे समय तक साथ रहेंगी।
खिड़की से झांकती चंबल की लहरें आज जैसे सवाल पूछ रही थीं — “तुम यहाँ सिर्फ़ नौकरी करने आए हो, या कुछ और भी ढूँढ रहे हो?”
मैं जवाब नहीं दे सका, लेकिन मन ही मन सोचा — “शायद दोनों।”
ऑफिस में आज एक नया कार्यभार सौंपा गया —नगर की पानी आपूर्ति पाइपलाइन की समस्या की जाँच करनी थी। कुछ फाइलें उठाईं, कुछ पुराने रिकॉर्ड, और मैं निकल पड़ा।
एक घर पर पहुँचते ही एक बुज़ुर्ग महिला ने दरवाज़ा खोला —
“बेटा, पानी अब दो-दिन से टपक-टपक आता है, बाल्टी भरते-भरते शाम हो जाती है।”
मैंने पाइपलाइन की जांच शुरू की। और वहीं पहली बार महसूस किया कि "सहायक अभियंता" की असली परिभाषा शायद दफ़्तर की मेज़ों पर नहीं, इन गलियों की ख़ाक में छुपी होती है।
समस्या का समाधान होने पर औरत ने कहा
“आप अफ़सर हो, लेकिन ऐसे खुद आकर देखते हो... अच्छा लगता है।”
मैं बस मुस्कराया।
शाम को घर लौटा तो
दिल कुछ हल्का लगा। चंबल की लहरें अब जैसे शांत थीं — शायद उन्हें जवाब मिल गया था।
"आज मैंने काम नहीं किया, एक रिश्ता जोड़ा है। और शायद पहली बार, ये शहर मुझे अपना मानने लगा है।"

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