जल की बूँद-बूँद कीमती है। ***** स्नान बाल्टी में पानी भरकर करे, फव्वारे से नहीं। ***** शेव व दंत मंजन मग में पानी भरकर करें, नल लगातार चालू रखकर नहीं। ***** कपडों की धुलाई बाल्टी में पानी भरकर करें, नल लगातार चालू रखकर नहीं। ***** वाहन बाल्टी में पानी भरकर साफ करें, नल से पाईप लगाकर नहीं। ***** पौधे लगे गमलों में पानी मग से डालें, नल में पाइप लगाकर नहीं। ***** घर के फर्श की धुलाई बाल्टी से पानी डालकर करें, नल में पाइप लगाकर नहीं। ***** खराब नल से टपकता पानी बंद करने के लिये तुरन्त कार्यवाही करें, आलस नहीं। ***** जल सम्पदा सीमित है इसका मितव्ययता पूर्वक सदुपयोग करें, अपव्यय नहीं। ***** जब पानी बिकेगा तोल, तब समझोगे इसका मोल! ***** बूँद-बूँद पानी, बचाऐ सो ज्ञानी।

चम्बल के किनारे एक वादा

चम्बल के किनारे, शाम की गुलाबी चादर ओढ़े हुए एक सजी-धजी बारात ठहरी है। लहरों की हल्की सरसराहट और पेड़ों पर लटकी झालरें जैसे खुद प्रकृति ने मेहमानों का स्वागत करने को सजावट की जिम्मेदारी ली हो।

 

 

बारात में सबसे चुपचाप बैठी थी  आवनी , जो इस पूरे शोर-शराबे के बीच जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में थी। उसकी निगाहें दूर नदी की तरफ थीं—जहाँ सूरज की आख़िरी किरणें पानी पर सुनहरी चूनर बुन रही थीं।

 

उधर, दूर एक पेड़ की छांव में रुद्र खड़ा था—वह जो आज का दूल्हा नहीं था, पर कभी आवनी के साथ जीवन का सपना देखा करता था। दो दिलों का रिश्ता, जो समय की तेज़ धारा में बह गया था।

 

सजावट में चमकते चिराग, ढोल की थाप और ख़ुशी के रंग, सबकुछ था वहाँ... बस दो दिलों की कहानी अधूरी सी थी।

 

और फिर—बस एक पल को—नज़रों का मिलना हुआ। कोई शिकवा नहीं, कोई इल्ज़ाम नहीं। सिर्फ़ एक ख़ामोश सा वादा: “जहाँ भी रहो, अपनी ख़ुशियों में मुझे शामिल समझना।”

 

चम्बल की लहरें दोनों की निगाहों में बहे उस वादे को अपने संग बहा ले गईं — न शोर, न निशान... बस यादें।

 

छः साल बीत चुके थे उस चुपचाप वादे को… 

चम्बल अब भी वही थी—शांत, सहृदय, और हर राज़ को अपने बहाव में सहेजती हुई।

 

इस बार आवनी आई थी अकेली—ना बारात थी, ना संगीत, बस दिल में एक कसक और हाथ में माँ की दी हुई डायरी। वह पुरानी जगह, वही पीपल का पेड़, जहाँ से नदी की गहराई सबसे सुंदर दिखती थी… वहीं बैठी, धीमे-धीमे पन्ने पलटने लगी।

 

दूसरी ओर, रुद्र जो अब एक सफल वाइल्डलाइफ फ़ोटोग्राफर था, संयोगवश उसी समय किसी डॉक्यूमेंट्री शूट के लिए चम्बल आया हुआ था। कैमरा उठाते हुए उसकी नजर उस पीपल के पेड़ की ओर गई, और फिर जैसे वक़्त ठहर सा गया…

 

आवनी?” — आवाज़ धीमी थी, पर दिल की लहरें तेज़।

 

वो मुड़ी, एक पल की चुप्पी… फिर एक हल्की मुस्कान: 

तुम अब भी वही सवाल पूछते हो, जैसे जवाब कभी बदलेंगे नहीं।”

 

दोनों ने एक ही जगह बैठकर वह डायरी साथ पढ़ी—हर पन्ना, जैसे किसी भूले पल की कुंजी हो। किसी ने कुछ जताया नहीं, बस चम्बल की लहरों को सुना और पेड़ों की सरसराहट को महसूस किया।

 

शायद प्यार वापस नहीं आया, पर जो लौटकर आया वो था: सुकून। 

एक अधूरी कहानी को तसल्ली की पूर्णविराम।

 

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आज की शाम चम्बल कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश लग रही है। मैं उसी स्थान पर बैठा हूँ जहाँ सालों पहले रुद्र और आवनी की कहानी ठहर गई थी। पीपल के पेड़ की जगह नए छोटे पौधे उग गए है लेकिन चम्बल पहले की तरह अविराम | हवा में हल्की नमी है, पेड़ की टहनियाँ धीमे-धीमे हिल रही हैं, और चम्बल की लहरें मेरे पैर छूकर जैसे कोई दबी हुई बात कहने की कोशिश कर रही हैं। 

 


मेरे हाथ में वही डायरी है —  और उसमें दर्ज वो कहानी जो कभी अधूरी मानी गई थी। मैंने पन्ने पलटे और वो हिस्सा पढ़ा जहाँ आवनी और रुद्र ने एक दूसरे की आँखों में बिना कुछ कहे सबकुछ कह दिया था। 

 

मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन आज उस कहानी में मैं खुद को महसूस कर रहा हूँ। जैसे वो चुप्पियाँ, वो अधूरापन — अब मेरी साँसों में बसने लगा है। 

 

मैंने डायरी का खाली पृष्ठ खोला, और पहली बार उनकी कहानी में अपना शब्द जोड़ा:

 

मैं सोचता हूँ, कुछ रिश्तों को पूरा करने के लिए 

उनके किरदारों को नहीं, बल्कि उनकी ख़ामोशियों को 

जीना पड़ता है। आज मैं बस उन्हें जी रहा हूँ — 

चम्बल की एक और शाम के साथ।

 

चम्बल अब भी बह रही है, लेकिन आज उसके पास एक और राज़ है — मेरा। 

मैं उठता हूँ, और एक बार फिर चम्बल को देखता हूँ। सूरज डूबने को है, लेकिन दिल में जो एहसास उगा है… वह शायद आज पूरा हो गया है।

 


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