बरगद की छांव में, जहां धरती से मिलता आसमान, वहां बैठकर कुछ पल, जी लेता हूँ मैं अपनी जिंदगानी।
उसकी जड़ें गहरी हैं, उसकी शाखाएँ फैली हुई, जैसे बुजुर्गों का आशीर्वाद, सदा सर पर छाया हुआ।
गर्मी की दोपहरी में, जब सूरज दिखता रूठा-रूठा, बरगद की छांव बन जाती, मेरे लिए एक सुखद सुथरा।
चिड़ियों का चहचहाना, हवा का गुनगुनाना, बरगद की छांव में बैठ, सब कुछ भूल जाना।
ये बरगद नहीं, एक दुनिया है अपनी, जहां हर रिश्ता, हर याद बसी है गहरी।
इस छांव में बैठ, याद करता हूँ वो पुरानी बातें, जहां दादी की कहानियाँ, और बचपन की वो साथी।
बरगद की छांव, एक पाठशाला है जीवन की, जहां सिखने को मिलता, प्रकृति का हर एक मंत्र।
इसलिए आज भी, जब भी मिलता समय, बरगद की छांव में जाकर, बिताता हूँ कुछ पल शांति के।

No comments:
Post a Comment