कई दिनों से कार्यालय के कार्यों में बाहर रहा। शहरों की भागदौड़, मीटिंग्स की गूंज, और फ़ाइलों की दुनिया में कहीं खुद को खोया सा महसूस कर रहा था। हर सुबह एक नई ज़िम्मेदारी, हर रात अधूरी नींद। लेकिन आज... आज मैं वापस हूँ। रावतभाटा में। अपने शहर में। अपने किनारे पर।
चंबल की लहरें आज कुछ अलग सी लग रही हैं। जैसे वो मुझे पहचानती हैं। जैसे कह रही हों—"तू लौट आया, चल बैठ, कुछ देर हमारे पास।"
मैं किनारे पर बैठा हूँ। हवा में वो पुरानी सादगी है, जो बड़े शहरों में खो जाती है। मिट्टी की ख़ुशबू, पानी की सरसराहट, और मन की शांति—सब कुछ जैसे फिर से जीवंत हो गया है।
थकान है, पर सुकून भी है।
दूरी थी, पर अब अपनापन है।
काम ज़रूरी था, पर यह पल जरूरी है आत्मा के लिए।
रात गहराती जा रही है,
पर मेरे भीतर एक उजाला है—
जो कल की सुबह को दिशा देगा
कुछ नया रचने का
कुछ बेहतर करने का
